रविवार, 15 नवंबर 2020

भारतीय प्रेस दिवस (16 नबम्वर), भाग-1

 भारतीय पत्रकारिता, दशा एवं दिशा – एक विहंगम दृष्टि

 भारतीय प्रेस दिवस (Indian Press Day)

 


 
भारतीय प्रेस परिषद (Press council of India) की स्थापना 16 नबम्वर, 1966 के दिन हुई थी, जिसका घोषित उद्देश्य था – 1. प्रेस की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना अर्थात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बर्करार रखना। तथा 2. भारत में प्रेस के स्तर को बनाये रखना व सुधारना अर्थात प्रेस की मनमानी को रोककर उस पर नैतिक अंकुश लगाना।

इस कार्य को करने के लिए प्रेस परिषद में एक अध्यक्ष (सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत जज) और एक सचिव के अतिरिक्त 28 सदस्य होते हैं, जिनमें से 20 प्रेस के प्रतिनिधि (मीडिया मालिक, श्रमजीवी पत्रकार एवं संपादक) होते हैं। तथा 5 सदस्य संसद (2 राज्य सभा और 3 लोक सभा) द्वारा नामित होते हैं और 3 शिक्षा, विधि व साहित्य ( क्रमशः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, बार कांउसिल ऑफ इंडिया और साहित्य अकादमी) से जुड़े होते हैं। प्रेस दिवस हर वर्ष 16 नबम्वर के दिन मनाया जाता है।

 भारतीय मीडिया – एक विहंगम दृष्टि –

 प्रिंट मीडिया – आज भारत की विविध भाषाओं में लगभग एक लाख से अधिक समाचार पत्र छप रहे हैं। हालाँकि आजकल हमारी सुबह मोबाईल पर व्हाट्सअप या इंस्टाग्राम के मैसेज के साथ होती है, लेकिन सुबह उठकर अखबार के पन्नों को पलटने की संतुष्टि अलग ही है। हिंदी, अंग्रेजी व क्षेत्रीय अखबारों की अपनी-अपनी दुनियाँ है। सबकी अपनी खूबियाँ हैं, तो अपनी सीमाएं भी। जिन सूचनाओं को हम विस्तार से जानना चाहते हैं, उन्हें पत्रिकाओं में पढ़ते हैं। और आज तो लगभग हर विषय पर विभिन्न भाषाओं में पत्रिकाएं छप रही हैं। खेल से लेकर बिजनेस, पर्यटन से लेकर धर्म-अध्यात्म, विज्ञान से लेकर साहित्य, पर्यावरण से लेकर हेल्थ-फिटनेस हर विषयों पर पत्रिकाओं की भरमार है।


 
इलैक्ट्रॉनिक मीडिया – में आकाशवाणी से लेकर एफ-एम चैनल्ज और सामुदायिक रेडियो उपलब्ध हैं। आकाशवाणी के ही लगभग 420 स्टेशन हैं, जो देश की 99 फीसदी जनसंख्या तक पहुंच रखते हैं। टीवी में दूरदर्शन से लेकर प्राईवेट चैनलों की भरमार है। दूरदर्शन के लगभग 200 चैनल उपलब्ध हैं जबकि देश में लगभग 1800 प्राइवेट चैनलों का प्रसारण हो रहा है।

 बाकि तकनीकी प्रगति के साथ वेब मीडिया, ऑनलाईन या न्यू मीडिया अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। इंटरनेट एवं सोशल मीडिया के साथ यह मोबाईल पर उपलब्ध है। ज्ञात हो कि मोबाईल धारकों की संख्या भारत में एक अरब का आंकड़ा छूने वाली है। हालांकि हर 10 में से 4 ही स्मार्टफोन धारक हैं, लेकिन इनकी संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। फेसबुक, व्हाट्सअप, ट्विटर, इंस्टाग्राम, टम्बलर, पिनटरेस्ट, यू-ट्यूब, लिंक्डेल जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्म इनके दैनिक जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं।



 
मीडिया असर – विहंगम दृष्टि

     प्रिंट मीडिया – का जादू आज भी बर्करार है। आज भी लोग छपे पर विश्वास करते हैं। अपनी लम्बी सेल्फ लाइफ के कारण यह सबसे विश्वसनीय माध्यम है। कितने घोटालों का पर्दाफाश यहाँ हो चुका है। लेकिन इससे जुड़ा स्याह पक्ष है, इसमें विज्ञापनों का बढ़ता स्पेस और समाचारों की घटती जगह। तय मानकों से अधिक विज्ञापन चलन बन चुके हैं। सबसे अधिक अखरता है जैकट पहने अखबार, जो पाठकों को सरदर्द से कम नहीं लगते। और कभी-कभी तो इनकी संख्या 3-4 तक हो जाती है। फ्रंट पेज पर हाल्फ जैकेट तो और भी इरिटेट करते हैं। इसमें भी एक नहीं कई बार तो दो-दो हाल्फ जैकेट देखने को मिल रहे हैं। फिर इसके साथ फ्रंट पेज पर नेगेटिव समाचारों की अधिकता सामान्य चलन बन चुकी है।

इलैक्ट्रॉनिक मीडिया – की विजुअल अपील प्रिंट से अधिक रहती है और यह अधिक प्रभावी भी है। साथ ही यह दिन भर की खबरों से अपडेट रखता है। लेकिन ब्रेकिंग न्यूज के नाम सनसनीखेज, नेगेटिव समाचारों की अधिकता इसके गंभीर प्रभाव को कम करती है। शाम व रात को पैनल डिसक्शन के नाम पर शौरगुल भरी निष्कर्षहीन चर्चाएं दर्शकों पर भारी पड़ती हैं।

 वेब मीडिया – के साथ पूरी दुनियाँ उपभोक्ताओं की मुट्ठी में है। इस माध्यम की विशेषता है इसका लोकतांत्रिक स्वरुप और इसकी इंटरएक्टिविटी। साथ ही यह  हर पल अपडेट रहता है, जिसके चलते पारम्परिक टीवी चैनल अप्रासांगिक हो चले हैं। हाँ इसमें इंफोर्मेशन ऑवरलोड़ की समस्या एक चुनौती है, जिसके चलते इसमें सूचनाओं का घालमेल, फर्जी सूचनाओं की बहुतायत रहती है, जिसके बीच सही और गलत सूचनाओं व तथ्यों का चयन करना एक चुनौती बनती जा रही है।


इस पृष्ठभूमि के साथ पत्रकारिता की नैतिक विकास एवं राष्ट्र निर्माण में क्या भूमिका हो सकती है, इसको जानने से पूर्व इसकी शक्ति-सामर्थ्य पर चर्चा करना उचित होगा।

 पत्रकारिता एवं मीडिया की विशेषता एवं शक्ति-सामर्थ्य -

•    लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ। वॉच डोग। सजग प्रहरि।

•    सूचनाओं के आदान-प्रदान का माध्यम, नागरिकों को जागरुक करता है।

•    लोकमत बनाने में मदद करता है, ऑपीनियन मेकिंग में सहायक।

•    नयी जानकारी व ज्ञान के साथ पाठकों व दर्शकों को शिक्षित करता है।

•    घोटालों का पर्दाफाश करता है। भ्रष्ट तन्त्र पर एक दबावसमूह (pressure group) का काम करता है।

•    व्यक्ति के चिंतन को प्रभावित करता है, जो क्रमशः उसके व्यवहार एवं चरित्र को निर्धारित करता है। क्रमशः परिवार एवं समाज के निर्माण या बिगाड़ का कारक बनता है।

मीडिया की इसी शक्ति को देखते हुए, कभी अकबर इलाहवादी ने कहा था कि खींचो न कमानों को तलबार निकालो, जब तोप मुकाबल हो तो अखबार निकालो। इसी तरह से अपने समय के महानतम यौद्धा नेपोलियन ने कहा था कि मैं सैंकड़ों-हजारों संगीनों की अपेक्षा तीन बिरोधी अखबारों को अधिक खतरनाक मानता हूँ।

 ये अखबार के दौर की बातें हैं। आज के दौर में टीवी चैनल्ज व सोशल मीडिया के युग में मीडिया की शक्ति अनन्त गुणा बढ़ चुकी है, जिसके प्रभाव को लेकर शायद आज उनके शब्द कुछ ओर होते। पिछले कुछ वर्षों से विकिलीक्स व पनामा पेपर्ज से लेकर हाल ही में पेराडाईस पेपर्ज के खुलासों तक, किस तरह भ्रष्टाचार में लिप्त अपने-अपने क्षेत्रों के दिग्गज सूखे पत्तों की भाँति काँपते नजर आए, कितने सत्ताधीश अर्श से फर्श पर आ गिरे, आधुनिक मीडिया की शक्ति-सामर्थ्य की बानगी पेश करते हैं।

 मीडिया ग्लैमर और युवा रुझान

आश्चर्य नहीं कि मीडिया की शक्ति के साथ इसका गलैमर व प्रभाव युवाओं को आकर्षित करता है। पत्रकारिता पाठ्यक्रमों से जुड़ने वाले अधिकाँश युवाओं को पूछने पर एक ही जबाव होता है कि वे टीवी एंकर या आरजे बनना चाहते हैं। इससे जुड़ी जिम्मेदारियाँ व भारी दायित्व से वे प्रायः अनभिज्ञ होते हैं। पत्रकारिता के मूल भाव से न्याय करने के लिए जिस सूझ, नैतिक बल, संयम, त्याग और व्याप्क एवं गहन अध्ययन की आवश्यकता होती है। जिस समय साध्य एवं कष्ट साध्य प्रक्रिया से गुजरकर इसका सही हकदार बनना होता है, इसके लिए आवश्यक धैर्य, श्रम व तप-त्याग के लिए प्रायः वे तैयार नहीं होते। सच यह है कि पत्रकारिता एवं मीडिया एक गुरुत्तर दायित्व से भरा पेशा है, जिसकी अपनी चमक है, अपना रोमाँच है और साथ ही वह अपनी कीमत भी माँगता है, जिसका कोई शोर्टकट नहीं।

इस कीमत को चुकाने की तैयारी किए बिना, जल्दी से शोर्टकट में इस पर छा जाने की मंशा रखने वाली भीड़ के चलते पत्रकारिता क्षेत्र आज दिशाहीनता एवं नैतिक अवमूल्यन के चिंताजनक दौर से गुजर रहा है।

दिशाभ्रम एवं नैतिक अवमूल्यन का दौर –

जिस मीडिया को समाज का दर्पण मानकर, प्रहरि की भूमिका में इसका सही स्वरुप दिखाकर इसको दिशाबोध देने का दायित्व था, वह अपने उतल या अवतल स्वरुप के कारण विकृत तस्वीर पेश कर रहा है। पूरे सप्ताह भर का अखबार उठाकर देखें, सुबह से शाम-रात तक के टीवी चैनल्ज पर चल रही बहसों व ब्रेकिंग न्यूजों को देखें या फिर इंटरनेट-सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे संदेशों पर गौर फरमाएं, तो नेगेटिविटी, सनसनाहट, जादू चमत्कार, शॉर्टकट, अंधविश्वास, ग्लैमर, चकाचौंध, फूहड़ता, अश्लीलता, हल्केपन की अधिकता मिलेगी, जिसके चलते देश-समाज व दुनियाँ में कुछ अच्छा भी हो रहा है, इस पर संदेह होने लगता है। जबकि बहुत कुछ अच्छा भी समाज व देश-दुनियाँ में हो रहा है। लेकिन इसका स्पेस मीडिया में किन्हीं कौनों तक सिमटा मिलता है। नकारात्मक तथ्यों की भरमार रहती है। कुल मिलाकर मीडिया की दशा व दिशा को देखकर कहें कि हम नैतिक अवमूल्यन के दौर से गुजर रहे हैं, तो गलत न होगा। सही-गलत के प्रति स्पष्ट समझ व सोच के अभाव में पत्रकारिता आस्था संकट के विषम दौर से गुजर रही है। (जारी... शेष अगली पोस्ट में - भारतीय पत्रकारिता - दशा, दिशा एवं दायित्वबोध)

सोमवार, 2 नवंबर 2020

वर्तमान पर्यावरण संकट एवं समाधान की दिशा

 प्रकृति-पर्यावरण की भी सुध ली जाए

पर्यावरण संकट के दौर का अभिशप्त जीवन - आज हम पर्यावरण संकट के विषम दौर से गुजर रहे हैं। पर्यावरण का हर घटक, चाहे वह जल हो या वायु, थल हो या नभ – हर कौना प्रदूषण की गंभीर मार से त्रस्त है। महानगरों एवं औद्योगिक क्षेत्रों में तो इसकी विकरालता अपने चरम पर है, जिसे भुक्तभोगी ही समझ सकता है। यहाँ की एक बड़ी आबादी इसके दमघोंटू वातावरण के बीच जीने के लिए अभिशप्त है, जो चिंता का विषय है, विचारणीय है। इसका प्रसार तेजी से शहरों व कस्वों में हो रहा है। नजदीक के गाँव भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।

ऐसे क्षेत्रों की नदियों को देखें, अधिकाँशतः गंदे नालों में तबदील हो चुकी हैं। जहाँ से भी ऐसी नदियाँ गुजरती हैं, इनके साथ मिलते खेतों में प्रयुक्त होने वाले विषैले रसायन, कीटनाशक भूमि के साथ भूमिगत जल को भी दूषित कर रहे हैं। इसके किनारे की आबादी कैंसर जैसे गंभीर रोगों के साथ जीने के लिए अभिशप्त है। हवा में नित्य घुलता जहर सांस सम्बन्धी कितने रोगों का कारण बन रहा है।

विक्षिप्तता की ओर ले जाता महानगरीय जीवन - बढ़ते प्रदूषण के कारण महानगर अपने दमघोंटू वातावरण के साथ गैस चेम्बर का रुप ले चुके हैं। उस पर ध्वनि प्रदूषण मिल जाने पर महानगरों का पर्यावरण एक स्वस्थ व्यक्ति को भी विक्षिप्तता की ओर ले जाने वाला सावित हो रहा है। विक्षिप्तता के इस माहौल में मनोरोग, अपराध एवं सामाजिक विघटन की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

समाधान के प्रयास एवं मूल कारण की खोज - ऐसे में, पर्यावरण प्रदूषण को ठीक करने के तमाम प्रयास चल रहे हैं। वैज्ञानिक नए अनुसंधानों के साथ, तो राजनेता नए कानूनों के साथ और बुद्धिजीवी तमाम सेमीनार-गौष्ठियों, नीति निर्माण एवं शोधपत्रों के माध्यम से इसके समाधान में जुटे हैं। इस सबके बावजूद पर्यावरण प्रदूषण का संकट और विकराल रुप लेता जा रहा है। पर्यावरण संकट के आत्यांतिक समाधान के लिए लिए इंसान को इसके मूल तक उतरना होगा, जो सीधे प्रकृति के साथ इंसान के सम्बन्धों पर टिका हुआ है।

प्रकृति की गोद में सभ्यता-संस्कृतियों का उद्भव-विकास - वस्तुतः पर्यावरण प्रकृति का ही स्थूल घटक है। प्रकृति से इंसान का कैसा सम्बन्ध है, इससे पर्यावरण  की स्थिति निर्धारित होती है। जब तक इंसान का प्रकृति के साथ स्वस्थ व सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध रहा, पर्यावरण स्वच्छ एवं संतुलित रहा। प्रकृति की गोद में ही तमाम सभ्यताओं का उद्भव हुआ और संस्कृतियां विकसित हुई।

विश्व की प्राचीनतम संस्कृति के प्रतिनिधि विचारशील ऋषि-मुनि प्रकृति की छत्र-छाया में वन अरण्य में विद्यार्जन करते हुए जीवन के सूत्रों की खोज करते रहे। जीवन के रहस्यों पर गहन चिंतन-मनन करते हुए जीवन की रीति-नीति का शाश्वत दर्शन व दिशा बोध (सनातन धर्म) दे गए।

प्रकृति के प्रति पूजनीय एवं श्रद्धास्पद भाव - प्रकृति के साथ स्वस्थ, श्रद्धास्पद एवं सहयोगात्मक संबंध में ही वैदिक ऋषियों ने मनुष्य के सुख शांति एवं कल्याण का मर्म देखा। यज्ञ जैसी विधा को संस्कृति के केंद्र में रखकर प्रकृति के प्रति पूजनीय एवं श्रद्धास्पद भाव को बनाए रखा, जो आज भी कुछ अंशों में सांस्कृतिक संस्कारों के रुप में विद्यमान है। प्रकृति के हर घटक के प्रति सम्मानीय एवं पूजनीय भाव इसकी मौलिक विशेषता रही।

विज्ञान एवं विकास के उन्माद में बिगड़ता संतुलन - किन्तु आधुनिक युग में पश्चिम में उठी भौतिकवाद की आँधी ने मानवीय आस्था एवं सोच में उलटफेर कर दिया। धर्म का स्थान विज्ञान ने ले लिया और प्रकृति के प्रति आस्था भाव खोता गया। संस्कृति, विकृति का शिकार हो चली व मानव और प्रकृति के मधुर रिश्ते खत्म होते गये। अपने विकास के उन्माद में विज्ञान प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का दंभ भरने लगा और अपने को उसके पुत्र व सहचर का रिश्ता भूल गया।

 विज्ञान का उपयोगितावादी दृष्टिकोण एवं पर्यावरण चेतना का लोप - प्रकृति से जो आत्मीय भाव था, वह आस्था की कमी के कारण बेचैनी, प्रतियोगिता, उपभोक्तावादिता और आक्रामकता में बदल गया। विज्ञान प्रकृति को उपयोगितावादी दृष्टि से देखता है। परिणाम स्वरूप प्रकृति के प्रति इसमें उस जीवन दर्शन का सर्वथा अभाव है जो उसमें श्रद्धास्पद भाव रखता हो। प्रकृति के प्रति उस सौंदर्य बोध के भी दर्शन नहीं होते, जो प्रकृति के सान्निध्य में शांति, आनन्द और रचनात्मकता से भरी सृजनशीलता का प्रेरक बन सके।

भौतिक चिंतन एवं भोगवादी जीवन दर्शन के चलते इंसान पहले से अधिक लोभी एवं स्वार्थी हो गया है। इसके साथ पर्यावरण चेतना का भी लोप हो गया है, जो अपने परिवेश व इसके अभिन्न घटकों, वृक्ष-वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं व नदी-तालाबों एवं पर्वत-मरूस्थल में भी आत्मीय भाव का आरोपण कर सके। 

पर्यावरण संरक्षण के सशक्त सांस्कृतिक आधार - जबकि आज भी देश के ग्रामीण आंचलों में ऐसे सांस्कृतिक पॉकेट मौजूद हैं, जहाँ वृक्षों की पूजा की जाती है, देवताओं के नाम पर अर्पित बनों का सहज रुप में संरक्षण हो रहा है। नदियों और पर्वतों को पूजनीय मानकर इनके संरक्षण की प्रक्रिया जारी है। यहाँ तक कि जीव-जंतुओं के प्रति भी आत्मीय भाव जीवित है, जिसके चलते पर्यावरण संरक्षण की सशक्त सांस्कृतिक परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहमान है।

 प्रकृति का अतिशय दोहन एवं आपदाओं की मार - लेकिन अपने सांस्कृतिक जड़ों से कटे प्रभावशाली जनसमूह के कारनामों की परिणति भयावह है। यहाँ प्रकृति के अतिशय दोहन से पर्यावरण संतुलन डगमगा रहा है व जिसकी परिणति बाढ़, भूकम्प, भूस्खलन, अतिवृष्टि, अकाल, सुनामी लहरों, तेजाबी वर्षा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के रूप में कहर बरसा रही है। 

पर्यावरण विघटन के साथ व्यक्तित्व विघटन एवं समाधान की तलाश -इस पर्यावरण असंतुलन से मानवी अंत:करण भी अछूता नहीं है। आुधनिक शोध अध्ययन बढ़ते मनोरोगों, मनोविक्षिप्तता एवं व्यक्तित्व विघटन के मूल में प्रकृति एवं पर्यावरण असंतुलन को एक प्रमुख कारक के रूप में पा रहे हैं। मानव और प्रकृति-पर्यावरण के बीच फिर से स्वस्थ एवं मधुर सम्बन्ध कैसे स्थापित हो? इस यक्ष प्रश्र को लेकर पर्यावरणविद् एवं विचारशील समुदाय चिंतनरत् हैं। 

पर्यावरण संकट के विषम दौर में बनें समाधान का एक हिस्सा - प्रकृति और मानव में एकता लाये बिना, इनके सम्बन्धों को पुन: आत्मीय बनाये बिना न तो मानवीय अस्तित्व सुरक्षित रह पायेगा और न ही इसके विकास के साथ स्थायी सुख, शांति व समृद्धि का स्वप्र पूरा हो सकेगा। प्रस्तुत पर्यावरण संकट का समाधान प्रकृति के प्रत्येक घटक के प्रति स्वस्थ एवं संवेदनशील व्यवहार एवं उपयोग से जुड़ा हुआ है, जिसे हर विचारशील इंसान को अपने स्तर पर निभाना होगा और दूसरों को भी इसके प्रति सचेष्ट करना होगा। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पर्यावरण संकट के इस विषम दौर में कहीं हम विकाराल रुप ले रही इसकी समस्या का हिस्सा तो नहीं हैं।

पुस्तक परिचय - आध्यात्मिक पत्रकारिता

  आध्यात्मिक पत्रकारिता को एक विधा के रुप में स्थापित करने का विनम्र प्रयास आध्यात्मिक पत्रकारिता एक उभरती हुई विधा है , जिसके दिग्दर्शन...